डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने भारत के नाभिकीय कार्यक्रम की कल्पना की थी । डॉ. भाभा ने नाभिकीय विज्ञान में अनुसंधान करने के लिए 1945 में टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान (टीआईएफआर) की स्थापना की एवं 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग का गठन किया गया । राष्ट्र के लाभ के लिए नाभिकीय ऊर्जा के दोहन के प्रयास को तेज करने के लिए, डॉ. भाभा ने जनवरी 1954 में परमाणु ऊर्जा संस्थान, ट्रॉम्बे (एईईटी), मुंबई की स्थापना की । बाद में एईईटी का नाम बदलकर भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) कर दिया गया । नाभिकीय ईंधन बनाने के लिए प्रारंभिक प्रयोगशाला स्तर के प्रयोग बीएआरसी में किए गए थे ।

जब देश के लिए नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम बनाया जा रहा था, तब समग्र नाभिकीय ईंधन चक्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की स्पष्ट रूप से परिकल्पना की गई थी । अतः ईंधन, भारी पानी और ईंधन पुनर्संसाधन से संबंधित आवश्यक सुविधाएं देश में स्थापित करने की योजना बनाई गई थी । विद्युत कार्यक्रम के लिए ईंधन की आवश्यकता के लिए औद्योगिक स्तर पर प्रचालन आवश्यक था और ट्रॉम्बे में पर्याप्त जगह नहीं थी । अतः ट्रॉम्बे से बाहर जाने का निर्णय लिया गया । उपयुक्त स्थल की खोज के लिए बैंगलोर, मद्रास और हैदराबाद का निरीक्षण करने के लिए वरिष्ठ वैज्ञानिकों की एक टीम गठित की गई । वरिष्ठ समिति ने विस्तृत जांच के बाद नाभिकीय ईंधन सम्मिश्र के स्थान के लिए डॉ. भाभा को हैदराबाद के चयन की अनुशंसा की । आंध्र प्रदेश सरकार ने वर्ष 1968 में परमाणु ऊर्जा विभाग को जमीन आवंटित की । हैदराबाद में कुछ उत्पादन संयंत्रों, साझा सुविधाओं और अन्य आवश्यक सुविधा की स्थापना के लिए 1968 में डॉ. विक्रम साराभाई की अध्यक्षता में एनएफसी बोर्ड बनाया गया । एनएफसी की स्थापना का उद्देश्य नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम के लिए ईंधन की भावी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक संगठन बनाना भी था ।

एनएफसी, बीएआरसी के प्रयोगशाला स्तर से निकल कर बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के शानदार उदाहरणों में से एक है। एनएफसी के लगभग हर संयंत्र में इसकी मूल अवधारणा से बदलाव आया है। नवाचार के कारण प्लांट की क्षमताओं में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है और इसी के कारण आज एनएफसी इस ऊंचे स्तर पर खड़ा है। एनएफसी को आत्मनिर्भरता और मेक इन इंडिया का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनने पर गर्व है।